सरकार को आंखें दिखातीं विदेशी सोशल मीडिया कंपनियां

-प्रमोद भार्गव-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

वाट्सऐप ने भारत सरकार द्वारा तीन माह पहले निर्धारित किए गए नियमों के विरुद्ध दिल्ली उच्च न्यायालय में दस्तक दे दी है। उसने दलील दी है कि नए दिशा-निर्देर्शों का पालन संभव नहीं है, क्योंकि ये व्यक्ति की निजता का उल्लंघन करते है। जबकि सरकार ने ये निर्देश निजता की रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए ही बनाए थे। दरअसल ये कंपनियां इसलिए सरकार को आंखें दिखा रही हैं, क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारें तथा उनके पहरुए अपनी छवि चमकाने के लिए इनका मनचाहा इस्तेमाल करते रहे हैं। चुनाव में भी इनका उपयोग-दुरुपयोग खूब होता है। जबकि देश के नेतृत्वकर्ता भलीभांति जानते है कि इन कंपनियों का मकसद केवल मोटा मुनाफा कमाना है। देश को नहीं भूलना चाहिए कि व्यापार के बहाने ही देश को फिरंगी हुकूमत ने गुलाम बना लिया था। अब ये कंपनियां नागरिकों का आर्थिक व मानसिक दोहन करने में लगी है। गोया, जिस तरह से सरकार ने चीनी ऐप पर रोक लगाई थी, उसी तरह इन पर अंकुश लगाने की जरूरत है।
करोड़ों की संख्या में देश के नागरिकों को प्रभावित करने वाला सोशल मीडिया जब बेलगाम, निरंकुश और अश्लील हो जाए तो उस पर लगाम लगाना ही देशहित है। इस सिलसिले में केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया ओटीटी प्लेटफॉर्म और न्यूज पोर्टल्स को मर्यादित बने रहने के लिए अपेक्षित दिशा-निर्देश जारी किए थे। जिससे नेटफिलिक्स-अमेजन, गूगल, फेसबुक, वाट्सऐप, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे इंटरनेट माध्ययम अनर्गल सामग्री नहीं परोस पाएं। यदि कोई अनुचित सामग्री प्रसारित हो भी जाए तो शिकायत मिलने के बाद उसे चैबीस घंटे के भीतर हटाना जरूरी था। सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन डाले जाने वाले कंटेंट को लेकर दिशा-निर्देश बनाने के लिए भारत सरकार को कहा था। इस डिजीटल कंटेंट को तीन माह के भीतर अमल में लाना था। अन्यथा कंपनियों को भारत से अपना कारोबार समेटना तय था। किंतु मियाद पूरी होने से पहले ही वाट्सऐप ने उच्च न्यायालय में यह कहते हुए अपील दायर कर दी कि ‘नई गाइडलाइन भारत के संविधान प्रदत्त निजता के अधिकारों का उल्लंघन करती है। क्योंकि इसमें सामग्री के स्रोत व पहचान बताने की अनिवार्य शर्त जुड़ी है।’ वाट्सऐप व अन्य प्लेटफॉर्म एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन अर्थात एक कोने से दूसरे कोने तक सूचना को गुप्त रखने के सिद्धांत पर काम करता है। कंप्युटर की भाषा में इसे एन्क्रिप्टेड यानी फाइल को गोपनीय करके देखना कहा जाता है। इसी बिंदु को अदालत में चुनौती दी गई है। साफ है, वाट्सऐप उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता को उजागार हो जाने का खतरा जताकर अदालत गया है। अर्थात सरकार यदि हर संदेश को जानना चाहती है तो यह एक तरह से जन निगरानी से जुड़ा मामला हो जाता है।
गोरांग महाप्रभुओं के सामने दंडवत होना हमारी पुरानी फितरत है। ज्ञान के जिस कथित विस्तार को विदेशी सोशल मीडिया अपनी सेवाएं भारत पर थोप रहे हैं, उस परिप्रेक्ष्य में यह स्पष्ट करना लाजिमी है कि भारत में ज्ञान, प्रौद्योगिकी, तकनीक और अनुसंधान की बजाय 52 फीसदी से भी ज्यादा लोग इंटरनेट का उपयोग केवल फेसबुक, ट्विटर, वाट्सएप इत्यादि के लिए करते हैं, जिसमें महज सतही जानकारियां होती हैं। इससे इतर बड़ी संख्या ऐसे प्रयोगकर्ताओं की है, जो महज अश्लील एवं नग्न वीडियो के लिए ही नेट का इस्तेमाल करते हैं। देश के अनेक नाबालिग पोर्नोग्राफी और नशे के अंतरराष्ट्रीय रैकेट से जुड़कर अपना जीवन बर्बाद कर चुके हैं। सोशल मीडिया के हानिकारक व अराजक तत्वों को केंद्र सरकार ने जान लिया था, इसीलिए रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि इस मीडिया का गलत उपयोग हो रहा है। आतंकी अपनी गतिविधियों को अंजाम देने तक के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, इसीलिए यह फेक न्यूज और अफवाहें फैलाने का सरल और कारगर माध्ययम बन गया है। लेकिन उसी को हर क्षेत्र में विकास का पर्याय मान लेना बड़ी भूल है, जिसे सुधारने की दिशा कठोर कदम उठाने की जरूरत है।
यदि अमेरिका और उसके महाप्रभुओं की अनुकंपा ही विकास के आधार होते तो चीन भी उनका अनुसरण कर रहा होता। फेसबुक के कर्ता-धर्ता जुकरबर्ग कई कोशिशों के बावजूद चीन में अपना धंधा स्थापित करने में नाकाम रहे हैं। जबकि जुकरबर्ग ने इस मकसद पूर्ति के लिए चीनी भाषा मंदारिन सीखी और अपनी पुत्री मैक्सी के जन्म से पहले चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से आग्रह किया था कि वे उसके लिए कोई चाईनीज नाम सुझाएं। लेकिन चीन इन भावुक टोटकों से नहीं पसीजा। जबकि जुकरबर्ग की पत्नी प्रेसिला चान खुद चीनी-वियतनामी मूल की अमेरिकी नागरिक हैं। बावजूद फेसबुक के लिए चीन के रास्ते बंद हैं। मालूम हो, दुनियाभर में इंटरनेट सेंशरशिप का अघोषित नेतृत्व करने वाले चीन में फेसबुक, गूगल, ट्विटर, इंस्ट्राग्राम जैसे विदेशी वेब ठिकानों पर अर्से से प्रतिबंध लगा है। बावजूद चीन दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यस्था वाला देश है और आगे भी उसकी प्रगति जारी है। दरअसल चीन ने मीडिया के इन पाश्चात्य माध्यमों को इसलिए मंजूर नहीं किया क्योंकि वह यूरोपीय साम्राज्यवाद की घातक गुलामी को भूला नहीं है।
ये पश्चिमी माध्यम भारत के अधिकतम लोगों को अंतर्जाल से जोड़ना चाहते हैं। इसलिए वेब ठिकानों के लिए डोमेन हिंदी समेत करीब 12 भारतीय भाषाओं में लिए जाने लगे हैं। इस नाते अंतर्जाल दुनिया में संवाद एवं संचार का सरल किंतु शक्तिशाली माध्यम बन चुका है। हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में काम करने वाले जन समूहों की बढ़ती आर्थिक हैसियत से पैदा हो रही बाजार की नई जरूरतें अंतर्जाल के इस विकासक्रम को सशक्त आधार दे रही हैं। गोया, यह आशंका भी प्रबल है कि फेसबुक के मुफ्त बेसिक में फ्री ई-बाजार की चाल अंतनिर्हित थी। इसीलिए फ्री-बेसिक्स अमल में लाने के लिए फेसबुक का जिस मोबाइल नेटवर्क से समझौता हुआ था, उस पर ट्राई ने रोक लगा दी थी। ट्राई समेत इस तकनीक के विशेषज्ञों का मानना था कि फ्री बेसिक्स प्लान एक घातक योजना थी, इससे भारतीयों की स्वतंत्र तरीके से इंटरनेट इस्तेमाल करने की सार्वजनिक सुविधा पूरी तरह से प्रभावित तो होती ही,साथ ही गोपनीयता भी भंग होती। यही नहीं फेसबुक को वस्तुओं के मूल्य निर्धारण का अधिकार भी मिल जाता, इससे उपभोक्ता डिजिटल भारत में वस्तु के दाम निर्धारण एवं मोलभाव की स्वतंत्रता खो देता।
यदि हम अकेले फेसबुक प्लेटफार्म की बात करें तो उसका मालिकाना हक अमेरिका स्थित फेसबुक इंक कंपनी के पास है,जबकि भारत में इसके उपभोक्ताओं से अनुबंध और व्यापार आयरलैंड की कंपनी द्वारा किया जाता है। भारत में जो फेसबुक इंडिया कंपनी है, वह केवल मुनाफे का धन अमेरिका भेजने का माध्यम बनी हुई है। बावजूद यदि देश में फेसबुक असहिष्णुता, अशांति, अश्लीलता या अराजकता फैलाने की सबब बनती है तो उसकी अबतक कोई जवाबदेही नहीं थी। इसीलिए सोशल साइटें धार्मिक टकराव का आधार भी बन जाती हैं। इस बाबत शीर्ष न्यायालय द्वारा बार-बार आदेशित करने के बावजूद फेसबुक ने शिकायत अधिकारी की नियुक्ति तो की है, लेकिन चालाकी बरतते हुए उसका मुख्यालय आयरलैंड रखा है। फेसबुक को मिलने वाली ज्यादातर अर्जियां सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वाली पोस्टें विलोपित करने के विषय से जुड़ी होती हैं। इस बाबत एक बड़ी विसंगति यह भी है कि फेसबुक में खाता खोलते वक्त खाताधारी के डिजिटल हस्ताक्षर की जरूरत नहीं है, किंतु शिकायती अर्जी में दस्तखत जरूरी हैं। इस पेचेदगी के चलते अधिकांश आवेदनों को फेसबुक सुनवाई के लायक ही नहीं मानता।
भारत की उदारता का इन माध्यमों ने कितना लाभ उठाया है, इसका पता इस बात से चलता है कि यूरोपीय महासंघ की सर्वोच्च अदालत ने फेसबुक और गूगल द्वारा यूरोप से अमेरिका को डेटा हस्तांतरित करने पर रोक लगाई हुई है। किंतु हमारे यहां डाटा का उपयोग जारी है। फेसबुक के 40 करोड़ से भी ज्यादा प्रयोगकर्ताओं की सभी सूचनाएं, मसलन चित्र, वीडियो, अभिलेख, साहित्य जो भी बौद्धिक संपदा के रूप में उपलब्ध हैं, उन्हें किसी को भी हासिल कराने का अधिकार है। इन जानकारियों को कंपनियों को बेचकर फेसबुक खरबों की कमाई कर रहा है। इन्हीं सूचनाओं को आधार बनाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय बाजार को अपनी मुट्ठी में ले रही हैं। इसके अलावा हरेक खाते से फेसबुक को औसतन सालाना 10,000 रुपए की आमदनी होती है। फेसबुक के 53 करोड़, वाट्सऐप 53 करोड़, यूट्यूब 44.8 करोड, 21 करोड़ इंस्टाग्राम और ट्विटर के 1.75 करोड़ भाारतीय ग्राहक हैं। विडंबना देखिए ये सभी माध्यम भारत में आयकर और सेवाकर से मुक्त हैं।

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