संसद का मानसून सत्र : लोकतंत्र का महायुद्ध या राष्ट्रीय सहमति का महापर्व ?
(लेखक – विनोद कुमार सिंह तकियावाला )
-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-
सर्वदलीय बैठक से शुरू हुआ राजनीतिक संग्राम,महत्त्वपूर्ण विधेयकों,संवैधानिक विमर्श, परिसीमन,महिला आरक्षण, भ्रष्टाचार और जनसरोकारों के मुद्दों पर सत्ता–विपक्ष की निर्णायक परीक्षा
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संसद है।संविधान निर्माताओं ने संसद को केवल कानून बनाने की संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संवाद, जनाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाले सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच के रूप में स्थापित किया।संसद की गरिमा केवल सत्ता पक्ष के बहुमत से नहीं,बल्कि एक सशक्त,जागरूक और उत्तरदायी विपक्ष से भी निर्मित होती है।लोकतंत्र का सौंदर्य इसी संतुलन में निहित है।सरकार जनादेश का प्रतिनिधित्व करती है,जबकि विपक्ष जनमत की निगरानी करता है।दोनों की सक्रिय और रचनात्मक भूमिका ही संसदीय लोकतंत्र को जीवंत बनाती है।इसी लोकतांत्रिक परंपरा को सुदृढ़ बनाए रखने के उद्देश्य से प्रत्येक संसदीय सत्र से पूर्व केन्द्र सरकार सर्वदलीय बैठक आयोजित करती है।यद्यपि यह संविधान द्वारा अनिवार्य नहीं है, फिर भी दशकों से विकसित यह संसदीय परम्परा सरकार और विपक्ष के बीच संवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम रही है।इस बैठक में आगामी सत्र की कार्ययोजना,विधायी प्राथमिकताओं,जनहित से जुड़े मुद्दों तथा सदन को व्यवस्थित और सुचारु रूप से चलाने पर विचार-विमर्श किया जाता है। लोकतंत्र में संवाद की यह परम्परा ही राजनीतिक मतभेदों को संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर बनाए रखने का आधार बनती है।20 जुलाई से प्रारम्भ हुए संसद के मानसून सत्र की शुरुआत इस बार सहमति के वातावरण में नहीं,बल्कि तीखे राजनीतिक मतभेदों के साथ हुई है।सत्र से पूर्व आयोजित सर्वदलीय बैठक में आम आदमी पार्टी,तृणमूल कांग्रेस तथा इंडिया गठबंधन के कई दलों ने उन सांसदों को आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताई,जिन्होंने अपनी मूल राजनीतिक पार्टी से अलग होने की घोषणा की है अथवा जिनकी स्थिति दल-बदल विरोधी कानून के अंतर्गत अभी लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष विचाराधीन है।विपक्ष ने इसे संसदीय मर्यादाओं के विपरीत बताते हुए बैठक का बहिष्कार किया। सरकार का पक्ष है कि निमंत्रण संसदीय अभिलेखों और उपलब्ध आधिकारिक स्थिति के आधार पर भेजे गए हैं तथा इसमें किसी प्रकार की प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं हुआ है।यह विवाद केवल एक बैठक तक सीमित नहीं है।इसके पीछे भारतीय राजनीति में लगातार बढ़ता अविश्वास,दल -बदल की घटनाएँ, गठबंधनों का विघटन,राजनीतिक ध्रुवीकरण तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर उठ रहे प्रश्न भी जुड़े हैं।विपक्ष का आरोप है कि सत्तारूढ़ दल विपक्ष को कमजोर करने की दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति पर कार्य कर रहा है।सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहती है कि लोकतंत्र में प्रत्येक निर्वाचित जनप्रतिनिधि को कानून के दायरे में राजनीतिक निर्णय लेने का अधिकार है तथा दल- बदल से जुड़े मामलों का अंतिम निर्णय संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार संबंधित अध्यक्ष अथवा सभापति ही करते हैं।इस बार मानसून सत्र का महत्त्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि सरकार अनेक महत्त्वपूर्ण विधेयकों को संसद में प्रस्तुत करने अथवा पारित कराने की तैयारी में है।संसद की उपलब्ध कार्यसूची और सरकारी संकेतों के अनुसार आयकर(संशोधन) विधेयक,सूक्ष्म,लघु एवं मध्यम उद्यम विकास(संशोधन)विधेयक, जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन)विधेयक,सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने संबंधी विधेयक, राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण (संशोधन)विधेयक तथा विदेशी अंशदान (विनियमन)अधिनियम में संशोधन जैसे विषय सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। हालाँकि संसद की कार्यसूची गतिशील होती है और कार्यमंत्रणा समिति अथवा सरकार के निर्णय के अनुसार इसमें परिवर्तन,नए विधेयकों का समावेश अथवा प्राथमिकताओं का पुनर्निर्धारण भी संभव है।सरकार का दावा है कि इन विधेयकों का उद्देश्य प्रशासनिक सुधार,न्यायिक दक्षता,कर व्यवस्था का सरलीकरण,निवेश को प्रोत्साहन, सुशासन तथा पारदर्शिता को और अधिक सुदृढ़ करना है।सरकार का यह भी कहना है कि विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए विधायी सुधारों की गति बनाए रखना समय की आवश्यकता है।यही कारण है कि मानसून सत्र को सरकार अपने तीसरे कार्यकाल के सबसे महत्त्वपूर्ण विधायी सत्रों में से एक मान रही है।दूसरी ओर राजनीतिक विमर्श का सबसे संवेदनशील विषय संविधान संशोधन,परिसीमन तथा महिला आरक्षण का प्रभावी क्रियान्वयन बना हुआ है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम संसद से पारित हो चुका है,किन्तु उसका वास्तविक क्रियान्वयन नई जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद ही संभव है।विपक्ष का आरोप है कि महिला आरक्षण को तत्काल लागू करने के बजाय भविष्य की प्रक्रिया से जोड़ दिया गया है। सरकार का कहना है कि संविधान के वर्तमान प्रावधानों के अंतर्गत परिसीमन के बिना आरक्षण लागू करना संभव नहीं है।स्पष्ट है कि यह विषय राजनीतिक बहस के साथ-साथ संवैधानिक व्याख्या का भी प्रश्न बन चुका है।परिसीमन आने वाले वर्षों की भारतीय राजनीति का सबसे महत्त्वपूर्ण संवैधानिक विषय बनता दिखाई दे रहा है। जनसंख्या के आधार पर लोकसभा क्षेत्रों के पुनर्गठन से राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व में परिवर्तन की संभावना है।दक्षिण भारत के अनेक राज्यों और क्षेत्रीय दलों ने पहले ही आशंका व्यक्त की है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त करने वाले राज्यों को प्रतिनिधित्व के स्तर पर नुकसान उठाना पड़ सकता है।दूसरी ओर उत्तर भारत के राज्य समान जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देते हैं।इसलिए परिसीमन केवल चुनावी गणित का विषय नहीं, बल्कि संघीय ढाँचे,क्षेत्रीय संतुलन और राष्ट्रीय राजनीतिक संरचना से जुड़ा संवेदनशील प्रश्न बन गया है।मानसून सत्र में विपक्ष की रणनीति भी लगभग स्पष्ट दिखाई दे रही है।विपक्ष संसद के भीतर सरकार को भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी,महँगाई,कृषि संकट,राज्यों के अधिकार,संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता,जाँच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग,दल-बदल, सामाजिक न्याय तथा महिला आरक्षण के क्रियान्वयन जैसे विषयों पर घेरने की तैयारी में है। इसके अतिरिक्त लद्दाख को संवैधानिक संरक्षण,छठी अनुसूची के प्रावधानों तथा पर्यावरणीय संरक्षण की माँग को लेकर सोनम वांगचुक द्वारा चलाए गए आंदोलन को भी विपक्ष राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाने का प्रयास करेगा।सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास, पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय जनप्रतिनिधित्व अब केवल क्षेत्रीय मुद्दे नहीं,बल्कि राष्ट्रीय नीति के अभिन्न अंग बन चुके हैं।भ्रष्टाचार का प्रश्न भी इस सत्र में प्रमुखता से उठ सकता है।विपक्ष विभिन्न सरकारी निर्णयों, सार्वजनिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली तथा राजनीतिक जवाबदेही को लेकर सरकार से प्रश्न पूछने की तैयारी में है।वहीं सरकार डिजिटल भुगतान, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण,सरकारी खरीद की ई-प्रणाली, जीएसटी, डिजिटल प्रशासन तथा तकनीक आधारित पारदर्शिता को भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत कर रही है। स्वाभाविक है कि इस विषय पर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद केवल बहुमत का मंच नहीं होती। संविधान के अनुच्छेद107 से 111 तक विधेयकों की संसदीय प्रक्रिया का उल्लेख है,जबकि अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन की विशेष प्रक्रिया निर्धारित करता है।इसी प्रकार दसवीं अनुसूची दल-बदल विरोधी कानून का आधार है।इन प्रावधानों का मूल उद्देश्य लोकतांत्रिक स्थिरता,जनादेश की रक्षा और संसदीय मर्यादाओं को सुरक्षित रखना है।यदि राजनीतिक विवादों का समाधान इन्हीं संवैधानिक व्यवस्थाओं के माध्यम से होता है तो लोकतंत्र मजबूत होता है; किन्तु यदि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ता है,तो उसका प्रभाव लोकतांत्रिक व्यवस्था पर दूरगामी होता है।यह भी स्मरण रखना होगा कि संसद का दायित्व केवल विधेयक पारित करना नहीं है।संसद सरकार से प्रश्न पूछती है,नीतियों की समीक्षा करती है,सार्वजनिक धन के उपयोग पर निगरानी रखती है तथा जनता की आकांक्षाओं को राष्ट्रीय नीति में स्थान देती है।इसलिए संसद का प्रत्येक दिन और प्रत्येक घंटा राष्ट्र की अमूल्य लोकतांत्रिक पूँजी है। यदि पूरा सत्र केवल हंगामे, नारेबाज़ी और स्थगन की भेंट चढ़ जाता है,तो सबसे बड़ा नुकसान जनता के विश्वास और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को होता है।आज भारत महँगाई,रोजगार, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं,कृत्रिम बुद्धिमत्ता,जलवायु परिवर्तन,कृषि सुधार,राष्ट्रीय सुरक्षा,साइबर सुरक्षा,शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक समरसता जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन विषयों पर गंभीर संसदीय विमर्श की अपेक्षा केवल विपक्ष या सरकार की नहीं,बल्कि पूरे राष्ट्र की है। जनता चाहती है कि संसद राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच अवश्य बने,किन्तु राष्ट्रीय समाधान का केन्द्र भी बनी रहे।20 जुलाई से प्रारम्भ हुआ यह मानसून सत्र केवल सरकार के विधायी एजेंडे अथवा विपक्ष के राजनीतिक प्रतिरोध तक सीमित नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता,संसदीय परम्पराओं और संवैधानिक मूल्यों की भी परीक्षा है।सरकार के सामने चुनौती है कि वह अपने बहुमत का उपयोग संवाद, सहमति और संवैधानिक मर्यादाओं के साथ करे,जबकि विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह तथ्य,तर्क और जनहित के आधार पर अपनी भूमिका निभाए।लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बहुमत नहीं,बल्कि संविधान के प्रति सामूहिक आस्था है।अंततः संसद किसी एक दल,गठबंधन या सरकार की नहीं,बल्कि भारत की जनता की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है। मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक गुण हैं,परन्तु संवाद उसका प्राण है।यदि यह मानसून सत्र राजनीतिक संघर्ष के बीच भी राष्ट्रीय सहमति का मार्ग प्रशस्त करता है,तो यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का नया अध्याय सिद्ध होगा।यदि संवाद की जगह केवल टकराव ले लेता है,तो इतिहास इसे एक खोए हुए अवसर के रूप में भी दर्ज करेगा। लोकतंत्र की वास्तविक विजय सत्ता की नहीं,बल्कि संसद की गरिमा,संविधान की प्रतिष्ठा और जनविश्वास की विजय होती है।
