तीसरे विश्वयुद्ध की आहट और गांधी
– प्रेरणा –
-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-
इतिहास विजय-पराजय-विनाश का मृत दस्तावेज नहीं है, न वह किसी की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की कहानी का विवरण है। इतिहास एक ऐसी पाठशाला है, जिसमें हम अपनी गलतियों से सीखने का पाठ पढ़ सकते हैं बशर्ते कि हम अक्ल से अंधे या काला अक्षर भैंस बराबर न हों। पिछले कुछ समय से लग रहा है कि हम ‘तीसरे विश्वयुद्ध’ की तरफ़ बढ़ रहे हैं। उसकी आहट तेज हो रही है। दुनिया के सबसे ताक़तवर राष्ट्रपति ट्रंप को इस बात का श्रेय है।
कई दिनों बाद एक ऐसे दोस्त का फ़ोन आया जिन्हें पता है कि मैं गांधीजी के विचारों को मानती हूं और उन पर काम भी करती हूं। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा- आज की परिस्थितियों ने आपकी याद दिला दी।
-‘क्यों, क्या हुआ?’ मैंने पूछा तो वे बोले : पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल नहीं मिल रहा, तो अब पदयात्रा के दिन वापस आते दिख रहे हैं; रोजगार का संकट भी ऐसा है कि लगता है चरखा चलाने के दिन लौट आएंगे।
उन्होंने यह सब भले मजाक में कहा हो, लेकिन यह सच है कि पिछले कुछ समय से मेरे मन में भी ऐसी बातें उठ रही हैं। गांधीजी का जन्म 1869 में हुआ था। 1891 में वे इंग्लैंड पहुंचे वकालत की पढ़ाई करने और 1893 में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे नौकरी करने। आप इन वर्षों का ध्यान रखिए, क्योंकि इन्हीं वर्षों में दुनिया में उपनिवेशवाद तेजी से फैल रहा था। इंग्लैंड ही नहीं, फ्रांस, जर्मनी, रूस, पुर्तगाल और अन्य यूरोपीय देश भी अपने उपनिवेशों की तलाश में थे।
औद्योगिक क्रांति के लगभग 75 वर्ष बाद सारे आका देशों को पता चल चुका था कि विकास के इस मॉडल को बनाए-टिकाए रखने के लिए असीमित ईंधन और कच्चे माल की आवश्यकता होगी जो किसी जगह इफरातन मिल नहीं सकता। इसलिए जरूरी है कि हम दुनिया के खेतिहर समाजों पर कब्ज़ा करें; और दूसरों से पहले करें। उपनिवेश फैलाने की यह होड़ जो तब शुरू हुई वह आज भी जारी है।
20 वीं सदी की शुरुआत के साथ ही ‘प्रथम विश्वयुद्ध’ की पृष्ठभूमि तैयार होने लगी थी। मोरक्को पर नियंत्रण को लेकर तनाव, बोस्निया पर कब्ज़ा, बाल्कन के युद्ध और दुनिया भर में हथियारों की होड़- सब तरफ़ अंधाधुंधी का ऐसा ही आलम था। इन्हीं बढ़ते तनावों के बीच जून 1914 में ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के उत्तराधिकारी की हत्या हुई, जिसने अंतत: ‘प्रथम विश्वयुद्ध’ का रास्ता खोल दिया।
एक तरफ़ यह चल रहा था तो दूसरी तरफ़ बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी का महात्मा बनने का सफर भी चल रहा था। फिर तो दो विश्वयुद्ध हुए, दुनिया ने अणुबम का पहला विनाश देखा; और दूसरी तरफ़ दुनिया ने गांधीजी के सत्य के प्रयोग और भारत की आजादी की अनोखी लड़ाई देखी! गौर करने की बात है कि गांधीजी की अहिंसा वह आध्यात्मिक अवधारणा मात्र नहीं है जो भारत की हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति से उपजी है। उनकी अहिंसा युद्ध और संघर्ष के बीच तपी व निखरी है। भगवद्गीता के संदेश को वे अपनी तरह से हमें बताते हैं: ‘आंख के बदले आंख का सिद्धांत पूरी दुनिया को अंधा बना देगा।’
इतिहास विजय-पराजय-विनाश का मृत दस्तावेज नहीं है, न वह किसी की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की कहानी का विवरण है। इतिहास एक ऐसी पाठशाला है, जिसमें हम अपनी गलतियों से सीखने का पाठ पढ़ सकते हैं बशर्ते कि हम अक्ल से अंधे या काला अक्षर भैंस बराबर न हों। पिछले कुछ समय से लग रहा है कि हम ‘तीसरे विश्वयुद्धÓ की तरफ़ बढ़ रहे हैं। उसकी आहट तेज हो रही है। दुनिया के सबसे ताक़तवर राष्ट्रपति ट्रंप को इस बात का श्रेय है कि वे दुनिया को घसीटकर विश्वयुद्ध के मुहाने तक ले आए हैं। महायुद्ध के मुहाने पर जब हम गांधीजी के साथ खड़े होते हैं तब वे हमें क्या कहते मिलते हैं?
‘उस हथियारबंद आदमी ने आपकी संपत्ति चुरा ली है; आपने उसके इस कृत्य के बारे में सोचा है; आप गुस्से से भरे हुए हैं; आप तर्क देते हैं कि उस बदमाश को दंडित करना है, अपने लिए नहीं, बल्कि अपने पड़ोसियों की भलाई के लिए; आपने कई हथियारबंद आदमियों को इक_ा किया है, आप उसके घर पर हमला करके उसे लूटना चाहते हैं; उसे इसकी सूचना मिल जाती है, वह भाग जाता है; वह भी क्रोधित है। वह अपने साथी लुटेरों को इक_ा करता है और आपको चुनौती भरा संदेश भेजता है कि वह दिन-दहाड़े आपके यहां डकैती करेगा।’
‘आप मजबूत हैं, आप उससे डरते नहीं हैं, आप उसका सामना करने के लिए तैयार हैं। इस बीच वह लुटेरा आपके पड़ोसियों को परेशान करता है। वे आपसे शिकायत करते हैं। आप जवाब देते हैं कि आप यह सब उनके भले के लिए कर रहे हैं। आपको इस बात की परवाह नहीं है कि आपका अपना सामान चोरी हो गया है। आपके पड़ोसी जवाब देते हैं कि लुटेरे ने उन्हें पहले कभी परेशान नहीं किया था। उसने अपनी लूटपाट तभी शुरू की जब आपने उसके खिलाफ शत्रुता की घोषणा की। आप दुविधा में फंसे हैं। आपको उन बेचारे आदमियों पर दया आती है, लेकिन उनकी बात सच है। अब आप क्या करें?’
‘यदि आप लुटेरे को अकेला छोड़ देंगे, तो आपकी बदनामी होगी। इसलिए आप उन गरीबों से कहते हैं: ‘कोई बात नहीं, आओ, मेरा धन तुम्हारा है, मैं तुम्हें हथियार दूंगा, मैं तुम्हें उनका इस्तेमाल करना सिखाऊंगा; तुम उस बदमाश को खूब परेशान करो; उसे अकेला मत छोड़ो।’ इस तरह लड़ाई बढ़ जाती है; लुटेरों की संख्या बढ़ जाती है। आपके पड़ोसियों ने जान-बूझकर खुद को असुविधा में डाल लिया है। इस प्रकार लुटेरे से बदला लेने की चाहत का परिणाम यह होता है कि आपने अपनी ही शांति भंग कर दी है। आप लगातार लूट और हमले के डर में जी रहे हैं। आपका साहस कायरता में तब्दील हो गया है।’
अगर मैं यह न बताऊं कि गांधीजी यह सब 1909 में, अपनी कालजयी किताब ‘हिंद-स्वराज्य’ में लिख रहे हैं, तो आपको लगेगा कि कोई चैनल पर बोल रहा है। यह तो हू-ब-हू आज की बात है। हमारी नयी पीढ़ी को गांधी को फिर से, फिर-फिर पढ़ना होगा। स्वराज और स्वदेशी की परिभाषा करते वक्त वे कहते हैं कि शोषणमुक्त आर्थिक ढांचा विकेंद्रित ही हो सकता है। जहां पर उत्पादन हो, वहीं पर उसका इस्तेमाल भी हो, ताकि जरूरत से ज़्यादा हुए उत्पादन के खपत के लिए बाजार ढूंढ़ते हुए आपको किसी दूसरे समाज को ग़ुलाम न बनाना पड़े।
हमारे देश में अगर एकता और शांति बनी रही, तो हमारी अपनी जनसंख्या ही इतनी है कि हमें दुनिया में दूसरे बाजार खोजने की जरूरत नहीं होगी। जो लोग किसी दूसरे आर्थिक ढांचे की बात करते हैं, यक़ीन जानिए कि उनकी नीयत में खोट है, या उनकी अक़्ल पर ताले पड़े हैं। पूंजीवादियों ने अपनी सात पुश्तों की जेब भरने के लिए विकास का यह सारा तमाशा खड़ा किया है। इसकी चमक-दमक के पीछे पर्यावरण का विनाश, आम जनता को बेवकू$फ बनाकर जल, जंगल, पशु और ज़मीन की प्राकृ तिक दौलत पर क़ब्ज़ा करने की चालाकी छिपी है। महात्मा गांधी इसका सिर्फ पर्दाफाश नहीं करते, वे एक न्यायपूर्ण, संतुलित और मानवीय व्यवस्था का विकल्प भी सुझाते हैं।
बड़ी पूंजी की गोद में पले-खेले और पश्चिमी शिक्षण से अंधे हुए तथाकथित विद्वान ऐंठ कर पूछते हैं : तो क्या हम फिर से बैलगाड़ी के जमाने में चले जाएं? मैं ऐसे सभी विद्वानों से पूछती हूं- तो क्या हम सब सामूहिक आत्महत्या कर लें? गांधीजी को मारे हमारे सौ साल भी पूरे नहीं हुए हैं। दुनिया आपके ही बताए रास्ते पर चली तो है! इस रास्ते पर चलते हुए हमारे बैल भी मर गए और हमारी बैलगाड़ियां म्यूजियम में पहुंच रही हैं; और हमारे हाथ में आपने दिया क्या है- जहरीला पर्यावरण, लोभी व भयभीत राष्ट्रों द्वारा हर तरह के संसाधनों पर क़ब्ज़े के लिए युद्ध, युद्ध और युद्ध!
‘आर्टिफ़िशल इंटेलिजेन्स’ का उद्घोष कर इंसान की हैसियत मिटाने की वैज्ञानिक योजना! घात लगाकर बैठे रूस और चीन! इस महाभारत में से इंसान के बचने की कोई सूरत नज़र आती हो तो मुझे बताइए। क्या आपको नहीं लगता कि कोई विकल्प खोजना ही होगा? मैं कहती हूं कि उसी विकल्प का नाम महात्मा गांधी है। आप खोजिए तो! बात मेरे दोस्त के मजाक से शुरू हुई थी और पहुंच गई गंभीर विमर्श तक! इसलिए ही कहती हूं कि जीवन में मजाक की अपनी जगह है, लेकिन जीवन मजाक नहीं है।
