भारत में रसोई गैस के इस्तेमाल में भारी उछाल, LPG खपत में 30 वर्षों में हुई छह गुना बढ़ोतरी, लेकिन शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच अब भी बड़ा अंतर बरकरार
नई दिल्ली, 17 मार्च (ऐजेंसी/सक्षम भारत)। भारत में स्वच्छ ईंधन की दिशा में पिछले कुछ दशकों में क्रांतिकारी बदलाव आया है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों के अनुसार, देश में एलपीजी (LPG) की खपत वर्ष 1998-99 के मुकाबले करीब छह गुना बढ़कर 2025-26 तक 2,754 टीएमटी (TMT) पहुंचने का अनुमान है। इस वृद्धि का मुख्य श्रेय ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ (PMUY) को जाता है, जिसने लकड़ी और गोबर जैसे पारंपरिक ईंधनों पर ग्रामीण निर्भरता को कम किया है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में करोड़ों लाभार्थियों तक सिलेंडर पहुँचने से अब घरेलू गैस की पहुँच देश के दुर्गम हिस्सों तक हो गई है।
कनेक्शन की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक होने के बावजूद, वास्तविक गैस खपत के मामले में शहरी परिवार अब भी काफी आगे हैं। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि दिल्ली में एक परिवार औसतन 11.4 किलो गैस प्रति माह इस्तेमाल करता है, जबकि बिहार में यह आंकड़ा मात्र 6.7 किलो है। इसका अर्थ है कि ग्रामीण क्षेत्रों में एक सिलेंडर दो महीने से भी ज्यादा चलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि कई ग्रामीण परिवार अब भी सिलेंडर रिफिल की लागत के कारण आंशिक रूप से पुराने ईंधन स्रोतों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे ग्रामीण और शहरी खपत के बीच एक बड़ा अंतराल (Consumption Gap) दिखाई देता है।
भारत को गैस-आधारित अर्थव्यवस्था बनाने की राह में पाइपलाइन नेटवर्क (PNG) एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। जहाँ LPG को सड़क मार्ग से कहीं भी पहुँचाया जा सकता है, वहीं PNG के लिए जटिल पाइपलाइन बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है, जो वर्तमान में केवल विकसित शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है। उत्तर प्रदेश में देश के कुल उपभोक्ताओं का 15% हिस्सा होने के बावजूद, बुनियादी ढांचे की कमी के कारण वहाँ के बड़े हिस्से में अब भी सिलेंडरों पर ही निर्भरता है। सरकार का अगला लक्ष्य शहरी प्लानिंग के साथ गैस पाइपलाइन नेटवर्क को जोड़ना है, ताकि पर्यावरण के अनुकूल इस ईंधन को और अधिक सुलभ बनाया जा सके।
