विकसित भारत के सारथी: प्रवासी भारतीय और 2047 का संकल्प
-सुनील कुमार महला-
-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-
हर साल 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है। इसे एन आर आई दिवस(नोन-रेजिडेंट इंडियन डे) भी कहा जाता है। पाठकों को बताता चलूं कि इस दिन को इसलिए चुना गया था, क्योंकि 9 जनवरी 1915 को महात्मा गाँधी दक्षिण अफ़्रीका से भारत वापस आए थे, और भारत की आज़ादी की लड़ाई में उन्होंने निर्णायक भूमिका निभाई थी। यदि हम यहां पर इस दिवस के इतिहास की बात करें तो यह दिवस साल 2003 से मनाया जा रहा है, जब पहली बार भारत सरकार ने प्रवासी भारतीयों के योगदान को सम्मान देने के लिए इसे आयोजित किया। यह कार्यक्रम भारत सरकार के विदेश मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स) द्वारा आयोजित होता है। प्रवासी भारतीय दिवस मनाने के मुख्य उद्देश्यों की यदि बात करें तो इसमें क्रमशः विश्व में बसे भारतीयों द्वारा भारत के विकास और समाज में दिए योगदान को सम्मानित करना, भारत और प्रवासी भारतीय समुदाय के बीच सम्बन्धों को मज़बूत करना, एक ऐसा मंच प्रदान करना जहाँ प्रवासी भारतीय अपनी राय, अनुभव और सुझाव साझा कर सकें तथा प्रवासी भारतीय सम्मान(अवार्ड) जैसे पुरस्कार देकर उन्हें सम्मानित करना है। गौरतलब है कि यह पुरस्कार भारत का सबसे बड़ा सम्मान है जो प्रवासी भारतीयों को दिया जाता है, जो विदेश में रहते हुए भारत और भारतीय समुदाय के लिए विशिष्ट योगदान देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रवासी भारतीय दिवस के प्राथमिक लक्ष्य भारत और विदेशों में बसे भारतीयों के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण करना है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य भारत के आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विकास में प्रवासी भारतीयों के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करना है। साथ ही, यह विश्व समुदाय के बीच भारत की सकारात्मक छवि को सुदृढ़ करते हुए विदेशों में भारत के प्रति बेहतर समझ विकसित करने का प्रयास करता है। प्रवासी भारतीय दिवस भारत के राष्ट्रीय लक्ष्यों के समर्थन को बढ़ावा देता है और विश्वभर में स्थानीय भारतीय समुदायों के कल्याण के लिए सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करता है। इसके अतिरिक्त, यह प्रवासी भारतीयों को अपनी पैतृक भूमि की सरकार और जनता से भावनात्मक व वैचारिक रूप से जुड़ने का एक प्रभावी मंच प्रदान करता है, जिससे पारस्परिक सहयोग और विश्वास और अधिक मजबूत होता है। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि साल 2003 में पहला सम्मेलन नई दिल्ली में हुआ और उसके बाद अन्य शहरों में भी पारंपरिक रूप से इसका आयोजन किया गया। उल्लेखनीय है कि प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन की शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के तहत प्रवासी भारतीय समुदाय को मान्यता देने एवं उनके साथ जुड़ने हेतु एक मंच के रूप में की गई थी। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि 2015 में इसे दो साल में एक बार आयोजित करने का निर्णय भी लिया गया था। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रत्येक दो साल में 9 जनवरी को मनाया जाने वाला प्रवासी भारतीय दिवस (पीबीडी) एक उल्लेखनीय आयोजन है जिसके तहत भारतीय प्रवासियों द्वारा अपनी मातृभूमि के लिये दिये गए योगदान पर प्रकाश डाला जाता है। पिछले साल यानी कि वर्ष 2025 में 18वें प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन की थीम- विकसित भारत में प्रवासी भारतीयों का योगदान रखी गई थी तथा इसका आयोजन ओडिशा द्वारा 8 से 10 जनवरी 2025 तक किया गया था। इस साल 9 जनवरी 2026 को सांकेतिक रूप से प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाएगा, लेकिन इसके लिए यह आलेख लिखे जाने तक किसी विशेष थीम की आधिकारिक घोषणा सरकार द्वारा नहीं की गई है। बहरहाल, यदि हम यहां पर प्रवासी भारतीयों के योगदान की बात करें तो प्रवासी भारतीय विकसित भारत के निर्माण में आर्थिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक सेतु के रूप में अपना योगदान दे सकते हैं। वे न केवल भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा भेजकर अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करते हैं, बल्कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और स्टार्टअप फंडिंग के माध्यम से नवाचार को भी बढ़ावा देते हैं। इसके अतिरिक्त, विदेशों में अर्जित अपने तकनीकी ज्ञान और अनुभव (ब्रेन गेन) को भारतीय उद्योगों और शैक्षणिक संस्थानों के साथ साझा करके वे कौशल विकास(स्किल डेवलपमेंट ) में भी मदद कर सकते हैं। वैश्विक स्तर पर भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूत करने और भारतीय उत्पादों के लिए अन्तरराष्ट्रीय बाजार तैयार करने में भी उनकी भूमिका निर्णायक है। अंततः, अपनी मातृभूमि के साथ उनका भावनात्मक जुड़ाव और वैश्विक नेटवर्किंग भारत को 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने की गति को तेज कर सकती है। हालांकि, प्रवासी भारतीयों से संबंधित अनेक चुनौतियां भी विद्यमान हैं। मसलन, प्रवासी भारतीयों से संबंधित चुनौतियों को संक्षेप में देखें तो प्रमुख समस्या प्रशासनिक जटिलता और कानूनी बाधाओं की है, जहाँ भारत में निवेश या संपत्ति प्रबंधन के दौरान उन्हें लालफीताशाही और लंबी कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, कई देशों में प्रवासियों को नस्लभेद, कार्यस्थल पर असुरक्षा और कड़े वीजा नियमों जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। दूसरी ओर, भारत में दोहरी नागरिकता का प्रावधान न होना भी प्रवासियों की नई पीढ़ी को पूरी तरह जुड़ने से रोकता है। बहरहाल, यहां जानकारी देना चाहूंगा कि प्रवासी भारतीयों की सहायता और उनकी सुरक्षा के लिए भारत सरकार ने दो मुख्य डिजिटल प्लेटफॉर्म मदद पोर्टल तथा ई-माइग्रेट पोर्टल तैयार किए हैं। मदद पोर्टल की बात करें तो यह विदेश मंत्रालय की एक प्रभावी ऑनलाइन समाधान प्रणाली है, जिसका उद्देश्य विदेशों में रह रहे भारतीयों की आपातकालीन शिकायतों का निवारण करना है। यदि किसी प्रवासी भारतीय को विदेश में कानूनी समस्या, पासपोर्ट खोने, घरेलू उत्पीड़न या किसी भी प्रकार के संकट का सामना करना पड़ता है, तो वे इस पोर्टल पर अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। इसकी खासियत यह है कि शिकायतों की निगरानी सीधे उच्च अधिकारियों द्वारा की जाती है और समाधान की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होती है। वहीं दूसरी ओर ई-माइग्रेट पोर्टल मुख्य रूप से उन भारतीय श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया है जो रोजगार के लिए विदेश (विशेषकर खाड़ी देशों) जाते हैं। यह विदेशी नियोक्ताओं और भर्ती एजेंटों के डेटाबेस को एकीकृत करता है, जिससे श्रमिकों को फर्जी एजेंटों और शोषण से बचाया जा सके। इसके माध्यम से श्रमिक अपनी बीमा पॉलिसी (प्रवासी भारतीय बीमा योजना) और अपने रोजगार अनुबंध की वैधता की जांच आसानी से कर सकते हैं। आगे की राह के रूप में, भारत को प्रवासियों के लिए सिंगल विंडो डिजिटल सिस्टम और विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि उनके संपत्ति विवाद जल्द सुलझ सकें। साथ ही, नमन जैसे पोर्टल्स के जरिए उनकी शिकायतों का त्वरित निवारण और नो इंडिया प्रोग्राम जैसे सांस्कृतिक अभियानों के माध्यम से युवा पीढ़ी को जड़ों से जोड़ना आवश्यक है। सरकार को वैश्विक स्तर पर उनके अधिकारों के लिए सक्रिय कूटनीति का प्रयोग करना चाहिए, जिससे वे बिना किसी भय के विकसित भारत के विजन में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दे सकें। निष्कर्षतः, हम यह बात कह सकते हैं कि प्रवासी भारतीय दिवस केवल एक वार्षिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर में फैले भारतीय समुदाय और उनकी मातृभूमि के बीच के गहरे भावनात्मक और रणनीतिक संबंधों को पुनर्जीवित करने का एक सशक्त मंच है। यह दिवस प्रवासियों की उपलब्धियों का सम्मान करने के साथ-साथ उन्हें विकसित भारत 2047 के संकल्प में सक्रिय भागीदार बनाने का अवसर प्रदान करता है। प्रवासी भारतीय अपनी पूंजी, तकनीकी विशेषज्ञता और वैश्विक प्रभाव के माध्यम से भारत को विश्व गुरु बनाने की दिशा में एक जीवंत सेतु (लिविंग ब्रिज) का कार्य कर रहे हैं। अंततः, उनकी सक्रिय सहभागिता ही भारत को आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से एक सुदृढ़ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की कुंजी है।
