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रेरा को सही फटकार

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण अर्थात रेरा को जो कड़ी फटकार लगाई, उसके लिए वही उत्तरदायी है। इस प्राधिकरण का गठन जिन उम्मीदों के साथ किया गया था, वह उन पर खरा नहीं उतर पा रहा है। रेरा की लचर कार्यप्रणाली के चलते न जाने कितने लोग अदालतों का दरवाजा खटखटाने के लिए बाध्य होते हैं और सब जानते हैं कि वहां से न्याय मिलने में समय लगता है।

रेरा की निराशाजनक कार्यप्रणाली को इससे समझा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट को यह कहना पड़ा कि उसे बंद करना ही बेहतर है। उसने यह कठोर टिप्पणी भी की कि वह दिवालिया बिल्डरों को राहत देने के अलावा और कुछ नहीं कर रहा है। इसका सीधा मतलब है कि वह फ्लैट खरीदारों के हितों की रक्षा करने के स्थान पर उन बिल्डरों की पक्षधरता करता है, जिन पर उसे निगाह रखनी चाहिए, ताकि वे अपने प्रोजेक्ट समय पर पूरा करें और उनमें मनमाने तरीके से बदलाव न कर सकें।

भले ही सुप्रीम कोर्ट ने रेरा के खिलाफ कठोर टिप्पणी हिमाचल प्रदेश के एक मामले में की हो, लेकिन उसका यह आकलन तो लगभग सभी राज्यों के रेरा पर लागू होता है कि जिन लोगों के हितों की रक्षा के लिए इसे बनाया गया था, वे निराश और हताश हैं और उन्हें कोई प्रभावी राहत नहीं मिल रही। संभवतः इसीलिए उसने यहां तक कहा कि यदि इस संस्था को समाप्त भी कर दिया जाए तो उसे कोई आपत्ति नहीं होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि समय आ गया है कि सभी राज्य रेरा के नए सिरे से गठन पर विचार करें। इसमें संदेह है कि उसकी ओर से स्पष्ट निर्देश के बिना ऐसा हो सकेगा। उचित यह होगा कि केंद्र सरकार यह देखे कि सभी राज्यों के रेरा सही तरह काम करें, क्योंकि सबमें खामियां घर कर गई हैं। कई मामलों में यह देखने में आया है कि रेरा ने उन बिल्डरों का बचाव किया, जो फ्लैट खरीदारों से साफ तौर पर वादाखिलाफी कर रहे थे।

यदि रेरा के अस्तित्व में होने के बाद भी देश भर में लाखों प्रोजेक्ट अटके पड़े हैं तो इसका अर्थ है कि कहीं कुछ बड़ी गड़बड़ है। बहुत दिन नहीं हुए, जब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ही यह उजागर हुआ था कि दिल्ली-एनसीआर समेत कई शहरों में बिल्डरों ने बैंकों से मिलकर लाखों फ्लैट खरीदारों के साथ ठगी की। यह ठगी सबवेंशन स्कीम के जरिये की गई।

सबवेंशन स्कीम के तहत किसी परियोजना के तहत स्वीकृत राशि सीधे बिल्डरों के खातों में भेजी जाती थी। उन्हें घर खरीदारों को फ्लैट सौंपने तक ईएमआइ का भुगतान करना होता था, लेकिन कई मामलों में बिल्डरों ने फ्लैट तैयार किए बिना ईएमआइ का भुगतान बंद कर दिया। इस पर बैंक फ्लैट खरीदारों से शेष ईएमआइ की मांग करने लगे। इसे अन्याय और अंधेर के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता।

 

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