कृषि क्षेत्र में दुनिया मे सबसे तेज वृद्धि भारत मे दर्ज, किसानों की आय दुगुनी, विकसित भारत की नींव मजबूत
-कांतिलाल मांडोत-
-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-
बीते एक दशक में भारतीय कृषि जिस मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, वह सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है बल्कि गांव खेत और किसान की रोजमर्रा की जद्दोजहद का आईना भी है। नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार का किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य हासिल हो चुका है। वर्ष 2015 के मुकाबले 2024 तक किसानों की औसत आय में 126 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है और सालाना वृद्धि दर दस प्रतिशत से अधिक रही है। यह दावा ऐसे समय में सामने आया है जब देश 2047 तक विकसित भारत बनने का सपना देख रहा है और 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की बात हो रही है। ऐसे में कृषि क्षेत्र की यह तस्वीर उम्मीद भी जगाती है और कई सवाल भी खड़े करती है।
रिपोर्ट बताती है कि खेती आज भी देश के 46 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार दे रही है। यह अपने आप में बड़ा तथ्य है क्योंकि आमतौर पर यह माना जाता है कि विकास के साथ कृषि से लोगों का पलायन होगा। इसके उलट भारत में कृषि न सिर्फ रोजगार का बड़ा आधार बनी हुई है बल्कि इसमें महिलाओं की भागीदारी भी तेजी से बढ़ी है। 2017-18 के मुकाबले 2023-24 तक कृषि क्षेत्र में महिला श्रमिकों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। यही स्थिति विनिर्माण क्षेत्र में भी देखने को मिलती है। यह बदलाव सामाजिक संरचना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गहरे परिवर्तन का संकेत देता है।
कृषि विकास दर के आंकड़े भी इस दशक को ऐतिहासिक बनाते हैं। 2015-16 से 2024-25 के बीच कृषि क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दर 4.45 प्रतिशत रही है जो आजादी के बाद सबसे अधिक मानी जा रही है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह दर दुनिया की औसत कृषि विकास दर 2.88 प्रतिशत से कहीं ज्यादा है। चीन अमेरिका ब्राजील इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों की तुलना में भी भारत का प्रदर्शन बेहतर बताया गया है। इन आंकड़ों के आधार पर यह कहा जा रहा है कि भारतीय कृषि ने बीते दस वर्षों में दुनिया में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की है।
इस वृद्धि के पीछे कई कारण गिनाए जा रहे हैं। कृषि उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी एक बड़ा कारण है। न्यूनतम समर्थन मूल्य में बीते वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जहां 2008 के आसपास धान का एमएसपी करीब 850 रुपए और गेहूं का लगभग 1000 रुपए था वहीं 2025-26 तक यह क्रमशः 2369 और 2425 रुपए के स्तर तक पहुंच चुका है। यानी करीब ढाई गुना वृद्धि। इसके साथ ही सरसों गेहूं और चना जैसी फसलों के दाम भी दो तीन हजार से बढ़कर पांच सात हजार रुपए तक पहुंचने की बात कही जा रही है। इससे किसानों को बेहतर भाव मिला है और आय में इजाफा हुआ है।
तकनीक और सरकारी योजनाओं की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। ई नाम प्लेटफॉर्म से लेकर ड्रोन तकनीक सोलर पंप और प्रधानमंत्री कुसुम योजना जैसी पहलों ने खेती को पहले की तुलना में आसान और आधुनिक बनाया है। सिंचित क्षेत्र का विस्तार हुआ है कृषि यंत्रों पर अनुदान मिला है पाइपलाइन फव्वारा और खेत की तारबंदी तक के लिए सब्सिडी उपलब्ध कराई गई है। इन सबका असर यह हुआ कि खेती की उत्पादकता बढ़ी और लागत के कुछ हिस्सों में राहत मिली।
खेती में विविधता भी आय बढ़ने का बड़ा आधार बनी है। परंपरागत अनाज के साथ फल सब्जी मसाले पशुपालन और मछली पालन जैसे क्षेत्रों को अपनाने से किसानों के पास आय के नए स्रोत खुले हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि पशुपालन के दम पर किसानों की आय 2016 से 2023 के बीच 107 प्रतिशत तक बढ़ी थी। यह दिखाता है कि जो किसान एक ही फसल पर निर्भर नहीं रहे और बाजार की मांग के हिसाब से खुद को ढाला उन्होंने अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति हासिल की।
राजस्थान के कोटा जिले के लक्ष्मीपुरा गांव के किसान महावीर शर्मा की कहानी इसी बदलाव की मिसाल है। उन्होंने बिचौलियों को हटाकर किसानों को सीधे बाजार से जोड़ने की पहल की। एक कंपनी बनाकर आसपास के किसानों को जोड़ा और पहले ही वर्ष में आठ करोड़ रुपए का ट्रांजेक्शन किया। इस मॉडल से किसानों को उचित मंडी भाव मिला और खरीद बिक्री में पारदर्शिता आई। यह दिखाता है कि संगठित प्रयास और बाजार की समझ से खेती भी लाभकारी व्यवसाय बन सकती है।
इसी तरह कोटा के सांगोद क्षेत्र के किसान रविंद्र मेहता ने जैविक खेती को अपनाकर अपनी राह बनाई। पूरी तरह जैविक तरीके से गन्ने की खेती शुरू की और उससे गुड़ बनाकर पैकिंग के साथ बाजार में बेचना शुरू किया। इसके अलावा धान और खीरे जैसी फसलों से भी आय बढ़ाई। उनके खेत में यह दावा सच होता दिखता है कि किसानों की आय दोगुनी हो सकती है। आज उनके पास खेती से अर्जित संसाधनों के दम पर बेहतर जीवन सुविधाएं मौजूद हैं।
लेकिन इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही सच है। श्रीगंगानगर जिले के चक महाराजका के किसान अमृतपाल सिंह संधू जैसे किसान मानते हैं कि कागजों में आय भले ही बढ़ी दिखाई दे लेकिन वास्तविक आय में खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। वे सौ बीघा भूमि पर खेती करते हैं फिर भी खेती लाभ का सौदा नहीं रह गई है। बीज खाद कीटनाशक डीजल बिजली मजदूरी और मशीनों का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में जो आय बढ़ी है वह बढ़ती लागत में ही समा जाती है। इस कारण किसानों को लगता है कि उनकी जेब में बचत पहले जैसी ही है।
यही विरोधाभास इस पूरी बहस को जटिल बनाता है। एक तरफ औसत आय के आंकड़े हैं जो बड़ी वृद्धि दिखाते हैं तो दूसरी तरफ जमीनी हकीकत है जहां छोटे और मध्यम किसान आज भी जोखिम और अनिश्चितता से जूझ रहे हैं। मौसम की मार बाजार के उतार चढ़ाव और प्राकृतिक आपदाएं खेती को अस्थिर बनाती हैं। बड़े किसानों की असंतुष्टि भी इसी संदर्भ में सामने आती है क्योंकि उनके निवेश और खर्च का स्तर अधिक होता है और लाभ अपेक्षाकृत कम महसूस होता है।
खान पान के आंकड़े भी ग्रामीण और शहरी भारत में बदलती आर्थिक स्थिति की झलक देते हैं। प्रति व्यक्ति औसत उपभोग में अनाज की मात्रा कुछ कम हुई है जबकि फल ड्राई फ्रूट्स मछली और मांस जैसे उत्पादों की खपत बढ़ी है। यह बदलाव आय में वृद्धि और खान पान की पसंद में बदलाव का संकेत देता है। साथ ही यह भी दिखाता है कि कृषि अब सिर्फ पेट भरने तक सीमित नहीं है बल्कि पोषण और विविधता से जुड़ गई है।
नीति आयोग की रिपोर्ट देश के भविष्य के लक्ष्य से भी कृषि को जोड़ती है। 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और प्रति व्यक्ति 12 लाख रुपए सालाना आय के लिए आठ प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि दर की जरूरत बताई गई है। इसमें कृषि की भूमिका सिर्फ सहायक नहीं बल्कि आधारभूत मानी जा रही है। जब तक गांव और किसान मजबूत नहीं होंगे तब तक समग्र विकास अधूरा रहेगा।
इस पूरे परिदृश्य से यह साफ होता है कि बीते दस वर्षों में भारतीय कृषि ने कई मोर्चों पर प्रगति की है। तकनीक बाजार और नीतियों के स्तर पर बदलाव आए हैं और कई किसानों ने इसका लाभ उठाया है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सभी किसानों तक यह लाभ समान रूप से नहीं पहुंचा है। आय के औसत आंकड़े उम्मीद जगाते हैं पर वास्तविक आय लागत और जोखिम के सवाल अभी भी चुनौती बने हुए हैं।
आगे की राह में जरूरत इस बात की है कि खेती को सिर्फ उत्पादन बढ़ाने तक सीमित न रखा जाए बल्कि लागत घटाने जोखिम प्रबंधन और स्थिर आय पर भी उतना ही ध्यान दिया जाए। तभी खुशहाली के ये आंकड़े कागज से निकलकर हर किसान की जिंदगी में महसूस किए जा सकेंगे और खेती सचमुच देश की मजबूत बुनियाद बन पाएगी।
