राजनैतिकशिक्षा

भारत की सड़कें, प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही का संकट:-विकसित भारत 2047 के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती?

-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी-

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

भारत में सड़कों पर गड्ढों, खुले मैनहोल, निर्माण सामग्री के बेतरतीब ढेर, अधूरे अंडर- कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स और प्रशासनिक उदासीनता के कारण हर वर्ष हजारों लोग जान गंवा रहे हैं या स्थायी रूप से अपंग हो रहे हैं। क्या अधिकारियों और ठेकेदारों की लापरवाही की सज़ा केवल जांच और मुआवजे तक सीमित रहेगी? -आंखों पर परसेंट का कवर कब उतरेगा?-आम जनता अब समझते जा रही है
वैश्विक स्तरपर भारत आज स्वयं को 21वीं सदी की उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। विकसित भारत 2047 का लक्ष्य केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे, शासन क्षमता, नागरिक सुरक्षा और जीवन गुणवत्ता में आमूलचूल परिवर्तन का वादा है। लेकिन इसी भारत में सड़कों पर गड्ढों, खुले मैनहोल, निर्माण सामग्री के बेतरतीब ढेर, अधूरे अंडर- कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स और प्रशासनिक उदासीनता के कारण हर वर्ष हजारों लोग जान गंवा रहे हैं या स्थायी रूप से अपंग हो रहे हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र मानता हूं क़ि यह विडंबना नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक विफ़लता है, इसमें माननीय नेताओं की समय समय पर विपक्ष पर की जा रही टांटिंग बाज़ी 10 से 50 प्रतिशत वाला मामला अधिकारियों कर्मचारियों संबंधित लाइसेंसिंग अथारिटी द्वारा आंख मूंद कर बैठना आंखों पर परसेंट का कवर चढ़ा देना अब आम जनता आप समझते जा रही है जो, भारत की विकास यात्रा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। नोएडा में 27 वर्षीय इंजीनियर युवराज मेहता की गड्ढे में गाड़ी फंसने से हुई दर्दनाक मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया। सोशल मीडिया पर यह मामला ट्रेंड कर रहा है, क्योंकि यह किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही का परिणाम था। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर नागरिकों का गुस्सा फूट पड़ा। लोगों ने सवाल उठाया कि क्या टैक्स देने वाले नागरिकों की जान की कोई कीमत नहीं है?क्या अधिकारियों और ठेकेदारों की लापरवाही की सज़ा केवल जांच और मुआवजे तक सीमित रहेगी?यह घटना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की विफलता का प्रतीक बन गई। अभी दो दिवस पूर्व हमारे
गोंदिया राइस सिटी में भी रोड़ों पर हुए गड्डों से परेशान लोगों ने भीख मांगो एक रैली निकाली जिसमें आम जनता से पैसे लेकर नगर परिषद को देने की बात कही गई ताकि वह गड्डों को बुझा सके छत्तीसगढ़ की भाटापारासिटी में भी हमारे रिश्तेदार रोड पर पड़े गड्डे के कारण एक्टिवा से गिर पड़े और करीब एक माह तक अस्पताल में भर्ती रहे बड़ी मुश्किल से बहुत महंगा ट्रीटमेंट करने के बाद उनकी जान बची।
साथियों बात अगर हम भारत में सड़कों की खराब स्थिति एक संरचनात्मक संकट इसको समझने की करें तो भारत का सड़क नेटवर्क विश्व में दूसरा सबसे बड़ा है, जिसकी लंबाई 63 लाख किलोमीटर से अधिक है। इसके बावजूद सड़क सुरक्षा, गुणवत्ता और रखरखाव के मामले में भारत वैश्विक सूचकांकों में बेहद नीचे है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों के मामले में भारत लगातार विश्व में शीर्ष पर बना हुआ है। इनमें एक बड़ा कारण सड़कों की जर्जर स्थिति, गड्ढे, असमान सतह जलभराव और अवैज्ञानिक डिजाइन है। ग्रामीण भारत में स्थिति और भी भयावह है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के बावजूद बड़ी संख्या में ग्रामीण सड़कें या तो जर्जर हैं या समय पर मरम्मत के अभाव में जानलेवा बन चुकी हैं। बरसात के मौसम में गड्ढे दिखाई नहीं देते, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। पुरानी शहरी सड़कों पर नई पाइपलाइन, केबल और सीवेज के लिए की गई खुदाई महीनों तक खुली रहती है, और मरम्मत केवल कागज़ों में सटीक रूप से पूरी होती है।
साथियों बात अगर हम निर्माण मलबा और अंडर- कंस्ट्रक्शन अव्यवस्था कुछ समझने की करें तो, भारत के शहरों में अंडर- कंस्ट्रक्शन मकानों और इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का मलबा सड़कों पर पड़ा रहना आम बात हो गई है। नियमों के अनुसार निर्माण स्थल को सुरक्षित करना, चेतावनी संकेत लगाना और मलबा हटाना अनिवार्य है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन नियमों का खुलेआम उल्लंघन होता है। स्थानीय नगर निकाय, पुलिस और विकास प्राधिकरण एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर चुप्पी साध लेते हैं। आंखें और मुंह बंद व्यवस्था सड़क दुर्घटनाओं के बाद अक्सर देखा जाता है कि प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय होने में घंटों लगा देती है। एम्बुलेंस की देरी, ट्रैफिक पुलिस की अनुपस्थिति, और अस्पतालों में इलाज में लापरवाही कई बार मौत को निश्चित बना देती है। यह केवल व्यक्तिगत असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि एक संस्थागत संस्कृति का परिणाम है, जहां जवाबदेही का अभाव है। निर्माण कार्यों की अनुमति देने वाले विभागों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन यही विभाग अक्सर सुरक्षा मानकों की अनदेखी करते हैं। सड़क खुदाई की अनुमति देने के बाद उसकी निगरानी नहीं होती कि गड्ढा समय पर भरा गया या नहीं, चेतावनी बोर्ड लगाए गए या नहीं। यह लापरवाही दुर्घटनाओं की श्रृंखला को जन्म देती है, जिसे लेखकीय रूप से प्रशासनिक लापरवाही का साइकिल कहा जा सकता है।
साथियों बात अगर हम विकसित भारत 2047 बनाम सड़क सुरक्षा की हकीकत इसको समझने की करें तो यह विकसित भारत 2047 की परिकल्पना में विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर एक केंद्रीय स्तंभ है। सरकार ने भारतमाला, गतिक शक्ति, स्मार्ट सिटी मिशन और अमृत योजना जैसी कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं शुरू की हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल नई सड़कों और एक्सप्रेसवे का निर्माण ही विकास है, या मौजूदा सड़कों की सुरक्षा और रखरखाव भी उतना ही आवश्यक है?सरकार ने हाल के वर्षों में पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ सड़क निर्माण के लिए बायो-बिटुमेन जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया है, जिसमें कृषि अपशिष्ट और जैविक सामग्री का उपयोग होता है। यह तकनीक सड़कों की उम्र बढ़ाने, कार्बन उत्सर्जन कम करने और लागत घटाने में सहायक मानी जा रही है। लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उसके साथ गुणवत्ता नियंत्रण, पारदर्शिता और जवाबदेही भी सुनिश्चित की जाए।
साथियों बात अगर हम कई मामलों में न्यायपालिकाओं की सख्त टिप्पणीयाँ विशेष रूप से: बॉम्बे हाईकोर्ट का हस्तक्षेप रेखांकित करने वाली बात है, बॉम्बे हाईकोर्ट सहित कई न्यायालयों ने बार-बार नगर निकायों और राज्य सरकारों की लापरवाही पर नाराजगी जताई है। अदालतों का स्पष्ट मत है कि गड्ढों और खुले मैनहोल से होने वाली मौतें दुर्घटना नहीं, बल्कि मानव निर्मित आपराधिक लापरवाही हैं। अदालत ने कहा कि जब तक अधिकारियों और ठेकेदारों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा, तब तक स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा। केवल मुआवजा देना पर्याप्त नहीं है;दोषियों क़े खिलाफ आपराधिक कार्रवाई आवश्यक है। पीआईएल नंबर 71/2013, एक ऐतिहासिक मामला हैं। 13 अक्टूबर 2025 को बॉम्बे हाईकोर्ट की दो सदस्य बेंच न्यायमूर्ति की खंडपीठ ने पीआईएल नंबर 71/2013 पर आदेश सुनाया था। यह जनहित याचिका 2013 में तत्कालीन न्यायमूर्ति के एक पत्र के आधारपर स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लेकर दर्ज की गई थी। यह मामला इस बात का उदाहरण है कि समस्या कितनी पुरानी और गंभीर है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वर्षों की सुनवाई और निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई ठोस सुधार नहीं हुआ है, जो प्रशासन की उदासीनता क़ो स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
साथियों बात अगर हम इस भारतीय रोडो परगड्डों की स्थिति को अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य, में भारत की तुलना और सीख़ क़ो समझने की करेंतो विकसित देशों में सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु दर भारत की तुलना में कहीं कम है। इसका कारण बेहतर डिजाइन, नियमित रखरखाव, सख्त जवाबदेही और त्वरित आपातकालीन सेवाएं हैं। भारत यदि वैश्विक शक्ति बनना चाहता है, तो उसे केवलआर्थिक विकास ही नहीं, बल्कि नागरिक सुरक्षा के मानकों में भी वैश्विक स्तर अपनाने होंगे।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि जवाबदेही क़ि भारत की सड़कें केवल यातायात का माध्यम नहीं, बल्कि राज्य की शासन क्षमता और संवेदनशीलता का आईना हैं। युवराज मेहता जैसी मौतें हमें यह याद दिलाती हैं कि विकास के दावों के बीच नागरिकों की जान सबसे बड़ा सवाल है। विकसित भारत 2047 तभी संभव है, जब सड़क सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए, प्रशासनिक लापरवाही पर कठोर कार्रवाई हो, और न्यायपालिका के निर्देशों को केवल कागज़ों में नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर लागू किया जाए। सड़क पर हर गड्ढा, हर खुला मैनहोल और हर अधूरा निर्माण कार्य एक संभावित मौत है। सवाल यह नहीं कि अगली दुर्घटना कब होगी, सवाल यह है कि क्या हम उससे पहले जागेंगे?

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