आस्था, अधिकार और प्रशासन : प्रयागराज माघ मेले में टकराव….
प्रयागराज का माघ मेला, आस्था के संगम पर आपस में टकराती सत्ता, परंपरा और प्रशासन!
-लिमटी खरे-
-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-
इन दिनों प्रयागराज का माघ मेला देश-भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। इसकी एक प्रमुख वजह यह भी है कि बीते वर्ष यहीं सदी का सबसे भव्य कुंभ संपन्न हुआ था और उसके तुरंत बाद माघ मेले का आयोजन किया गया। प्रयागराज का मेला केवल एक धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता, सनातन परंपरा और लोकतांत्रिक प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन का एक जीवंत प्रतीक भी माना जाता रहा है।
लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इस संतुलन को गंभीर रूप से डगमगाता हुआ दिखाया है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज के संगम स्नान को लेकर उपजा विवाद अब केवल एक संत और प्रशासन के बीच मतभेद तक सीमित नहीं रह गया है। यह विवाद धीरे-धीरे आस्था बनाम शासन, परंपरा बनाम न्यायिक प्रक्रिया, संवेदनशीलता बनाम प्रशासनिक सख्ती जैसे मुद्दों पर एक राष्ट्रीय बहस का रूप ले चुका है।
माघ मेले में शंकराचार्य को लेकर खड़ा हुआ यह विवाद किसी एक व्यक्ति, पद, नोटिस या कथित जोर-जबरदस्ती का मामला मात्र नहीं है। यह टकराव भारतीय लोकतंत्र में धार्मिक परंपराओं, संवैधानिक संस्थाओं और प्रशासनिक अधिकारों के बीच मौजूद उस अत्यंत महीन और जटिल रेखा को उजागर करता है, जहां छोटी-सी चूक या संवादहीनता भी व्यापक सामाजिक तनाव का कारण बन सकती है। माघ मेला केवल एक प्रशासनिक आयोजन नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में किसी शीर्ष धार्मिक संत के साथ दुर्व्यवहार का आरोप-चाहे वह सही हो या गलत-शासन और प्रशासन की छवि पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए पर्याप्त होता है।
मौनी अमावस्या जैसे महास्नान पर्व पर किसी संत, विशेषकर शंकराचार्य पद पर आसीन व्यक्तित्व का संगम स्नान से वंचित रह जाना सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज का आरोप है कि मेला प्रशासन ने उन्हें न केवल स्नान से रोका, बल्कि अपहरण जैसी परिस्थितियां उत्पन्न कीं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें उनके शिष्यों से अलग कर दिया गया और शिष्यों के साथ पुलिस द्वारा कथित रूप से मारपीट की गई।
वहीं, मेला प्रशासन ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा कारणों से केवल पैदल स्नान का अनुरोध किया गया था। यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है-क्या पैदल जाकर स्नान कराना ही एकमात्र विकल्प था? क्या संवाद और समन्वय का कोई दूसरा रास्ता नहीं अपनाया जा सकता था? क्या इतने संवेदनशील अवसर पर टकराव से बचना संभव नहीं था?
प्रशासन शायद यह भूल गया कि संतों के लिए प्रोटोकॉल केवल सुविधा का विषय नहीं होता, बल्कि वह सम्मान और परंपरा से गहराई से जुड़ा होता है। कहा जाता है कि लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व मुगल काल में भी आदि शंकराचार्यों की पालकी के साथ पेशवाई या शाही स्नान की सनातनी परंपरा का निर्वहन होता रहा है। आरोप है कि मेला प्रशासन की हठधर्मिता के चलते इस ऐतिहासिक परंपरा को तोड़ा गया।
इस पूरे प्रकरण के बाद विवाद के नए-नए आयाम सामने आते जा रहे हैं। मेला प्रशासन द्वारा जारी किया गया एक नोटिस इस टकराव को और अधिक जटिल बना गया। इस नोटिस में शंकराचार्य महाराज से यह पूछा गया है कि वे अपने नाम के साथ ‘शंकराचार्य’ क्यों लिखते हैं। नोटिस में देश की सर्वाेच्च अदालत में लंबित मामले का हवाला देते हुए 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा गया है। तकनीकी दृष्टि से यह नोटिस सही हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके लिए समय और संदर्भ का चयन उचित था? जब संत समाज पहले से आहत और आक्रोशित हो, तब इस तरह का नोटिस जारी करना क्या आग में घी डालने जैसा नहीं है?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती इस संदर्भ में स्पष्ट रूप से कहते हैं कि शंकराचार्य की मान्यता न तो सरकार से मिलती है और न ही अदालत से, बल्कि यह अन्य पीठों की स्वीकृति और परंपरागत नियमों से तय होती है। उनका दावा है कि दो पीठों ने उन्हें मान्यता दी है, जबकि एक पीठ ने मौन स्वीकृति प्रदान की है।
यह पूरा टकराव भारतीय व्यवस्था की एक बड़ी विडंबना को उजागर करता है, जहां सदियों पुरानी धार्मिक परंपराएं और आधुनिक न्यायिक प्रक्रियाएं आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। जानकारों का मानना है कि अफसर कानून की व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन आस्था की व्याख्या उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। ऐसे मामलों को केवल कानूनी चश्मे से देखने पर समाधान निकल पाना कठिन प्रतीत होता है।
दूसरी ओर, यह मत भी सामने आता है कि ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज कई बार शीघ्र आवेश में आ जाते हैं। शंकराचार्य पद पर आसीन होने के बाद भी उनके आवेशपूर्ण व्यवहार के अनेक उदाहरण चर्चा में रहे हैं। सनातन धर्म में संन्यास परंपरा को त्याग, संयम और वैराग्य की सर्वाेच्च कसौटी माना गया है। विशेषकर शंकराचार्य जैसे महान पद पर आसीन व्यक्तित्व से समाज यह अपेक्षा करता है कि वह न केवल वेद-उपनिषदों का ज्ञाता हो, बल्कि अपने आचरण से भी आदर्श प्रस्तुत करे।
शास्त्रों में काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और मत्सर-इन षड्विकारों के त्याग को संन्यास का मूल तत्व बताया गया है। ऐसे में बार-बार आवेश प्रकट होना उचित नहीं ठहराया जा सकता। गीता में स्पष्ट कहा गया है-क्रोधाद्भवति सम्मोहः, अर्थात क्रोध से विवेक का नाश होता है। आदि शंकराचार्य की अद्वैत परंपरा के उत्तराधिकारी माने जाने वाले शंकराचार्य से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे हर परिस्थिति में शांति, धैर्य और करुणा का परिचय दें। किंतु मीडिया संवादों, सार्वजनिक मंचों और विवादित विषयों पर उनकी तीखी भाषा और उग्र प्रतिक्रियाएं बार-बार चर्चा का विषय बनती रही हैं। इससे कहीं-न-कहीं यह धारणा बनती है कि भावनात्मक संयम की कसौटी अभी पूरी तरह पार नहीं हो सकी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं सन्यासी हैं, इसलिए उम्मीद की जाना चाहिए कि वे इस पूरे मामले में स्वयं ही संज्ञान लेंगे और इस मामले के अनावश्यक तूल पकड़ने के पहले ही इसका निदान निकालकर सभी के सम्मान को बरकरार रखने में महती भूमिका निभाएंगे . . .
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