राजनैतिकशिक्षा

सुप्रीम कोर्ट का उपद्रवियों के प्रति जीरो टॉलरेंस नजरिया

-मनोज कुमार अग्रवाल-

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

दिल्ली के दंगाइयों को शीर्ष अदालत ने राहत देने से सीधा इंकार कर दिया यह अदालत की अराजकता से निबटने की जीरो टॉलरेंस को नीति का हवाला देता है। उच्चतम न्यायालय ने 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में आरोपियों उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से साफ इंकार करते हुए कहा है कि उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। अदालत ने साथ ही उमर खालिद और शरजील इमाम पर इस मामले में एक साल तक जमानत याचिका दाखिल करने पर भी रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की बैंच ने हालांकि इस मामले में अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाय अहमद को कुछ शर्तों के साथ जमानत दी है।
इस मामले में बैंच ने कहा, अदालत इस बात से संतुष्ट है कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत सामग्री से याचिकाकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोप सिद्ध होते हैं। इन याचिकाकर्ताओं के संबंध में वैधानिक कसौटी लागू होती है। कार्यवाही के इस चरण में उन्हें जमानत पर रिहा करना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि जिन लोगों को जमानत मिली है, उनकी भूमिका सीमित और परिस्थितिजन्य मानी गई है, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम पर दंगों की साजिश रचने, भीड़ को भड़‌काने और सुनियोजित तरीके से हिंसा को दिशा देने के गंभीर आरोप हैं। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता। देखा जाये तो उच्चतम न्यायालय का यह फैसला केवल दो व्यक्तियों की जमानत याचिका का निपटारा नहीं है, बल्कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा, कानून व्यवस्था और राष्ट्रीय संकल्प का स्पष्ट संदेश है।
आपको पता रहे उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे लोग कोई साधारण आरोपी नहीं हैं। ये वह चेहरे हैं जिन्होंने विचारधारा की आड़ में सड़कों पर आग लगाने की मानसिकता को खाद पानी दिया। यह साबित हो चुका है कि दिल्ली दंगे अचानक नहीं भड़‌के थे। उनके पीछे शब्दों के बारूद, भाषणों की चिंगारी और योजनाबद्ध उकसावे की लंबी तैयारी थी। ऐसे मामलों में यदि अदालत नरमी दिखाती, तो यह न केवल न्याय के साथ अन्याय होता बल्कि समाज के लिए एक खतरनाक संकेत भी जाता। अदालत ने सही कहा कि इन दोनों की स्थिति अन्य आरोपियों से अलग है। यह अंतर केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है। दंगा केवल पत्थर फेंकने से नहीं होता, दंगा उस सोच से पैदा होता है जो समाज को बांटने का काम करती है। जब किसी मंच से यह कहा जाए कि सड़‌कों पर उतर कर व्यवस्था को जाम कर दो, तब वही शब्द बाद में आग वन जाते हैं।
जमानत खारिज करने का फैसला उन सभी लोगों के लिए चेतावनी है जो खुद को एक्टिविस्ट या बुद्धिजीवी बताकर कानून को ठेंगा दिखाना चाहते हैं। यह फैसला बताता है कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब अराजकता फैलाने की छूट नहीं है। मुकदमे में देरी को लेकर अदालत की टिप्पणी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वर्षों से एक तर्क गढ़ लिया गया था कि अगर मुकदमा लंबा चल रहा है, तो आरोपी को स्वतः राहत मिलनी चाहिए। यह सोच न्याय व्यवस्था को कमजोर करती है। अगर गंभीर साजिशों में केवल समय के आधार पर जमानत मिलने लगे, तो हर देश विरोधी ताकत समय को हथियार बना लेगी। इस फैसले का सबसे बड़ा असर उपद्रवी और दंगाई मानसिकता वाले लोगों पर पड़ेगा। अब यह भ्रम टूटेगा कि लंबी कानूनी प्रक्रिया अंततः उन्हें बचा लेगी। देखा जाये तो अदालत का सख्त रुख भारत की आतंकवाद के खिलाफ चल रही लढाई को मजबूत करता है।
आपको बता दें यह फैसला उन आम नागरिकों के लिए भी भरोसे का आधार है जिन्होंने दंगों में अपने घर, दुकानें और परिजन खोए। उनके लिए न्याय केवल सजा नहीं, बल्कि यह विश्वास है कि सिस्टम उनके साथ खड़ा है। कुछ लोग इसे कठोरता कहेंगे, लेकिन सच यह है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए कठोर फैसले जरूरी होते हैं। उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज होना इस बात का प्रमाण है कि भारत की न्यायपालिका आज भी राष्ट्र की सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द और संविधान की मूल भावना को समझती है। यह फैसला आने वाले समय में न केवल कानूनी मिसाल बनेगा, बल्कि उन सभी ताकतों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी भी होगा जो भारत को भीतर से तोड़ने का सपना देखती हैं। यह निर्णय बताता है कि भारत कमजोर नहीं है, भारत चुप नहीं है और भारत अब दंगों की राजनीति को वर्दाश्त करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। हालिया कानूनी घटनाक्रमों और न्यायिक टिप्पणियों के अनुसार, खुद को एक्टिविस्ट या बुद्धिजीवी बताकर कानून से ऊपर समझने वाले व्यक्तियों के खिलाफ सख्ती बढ़ी है। अदालतों ने स्पष्ट किया है कि एक्टिविस्ट या बुद्धिजीवी होने का लेबल किसी व्यक्ति को आपराधिक जांच या कानूनी प्रक्रिया से सुरक्षा प्रदान नहीं करता है। कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं। पिछले कुछ वर्षों में भीमा कोरेगांव और दिली दंगों जैसे मामलों में कई चर्चित चेहरों की गिरफ्तारियों और अदालतों द्वारा उनकी जमानत याचिकाओं को खारिज किए जाने को इस दिशा में एक बड़ा झटका माना गया है। जांच एजेंसियों ने इन पर अर्बन नक्सल या देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगाए हैं। यूएपीए जैसे कड़े कानूनों के तहत की गई कार्रवाई और अदालतों द्वारा साक्ष्यों के आधार पर दी गई कड़ी टिप्पणियों ने यह संदेश दिया है कि वैचारिक स्वतंत्रता की आड़ में हिंसा या अस्थिरता को बढ़ावा देना स्वीकार्य नहीं होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न मामलों में कहा है कि विरोध का अधिकार मौलिक है, लेकिन यह कानून के शासन के उल्लंघन का अधिकार किसी को नहीं देता है।
जाहिर है कि कानून का शासन बनाए रखने के लिए अदालत का भी सख्त रुख होना अत्यंत महत्वपूर्ण है इसके बिना सामूहिक गुंडई अराजकता फैलाने और भीड़ तंत्र कायम करने के षडयंत्रों पर नकेल डालना संभव नहीं होगा।

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