संत कबीर का संसार को संदेश

-डा. राजन तनवर-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा। हिंदू मुस्लिम सिख इसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा।’ समस्त मानवता की सेवा करने में तथा इनसानियत का पाठ पढ़ाने में संत कबीर ने अपना पूरा जीवन लगा दिया ताकि मानव अपने जीवन का सही लक्ष्य समझे तथा सभी के प्रति समान दृष्टिकोण रखे। ऊंच-नीच, भेदभाव, भाई-भतीजावाद से ऊपर उठकर ही मानव अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। यही कारण है कि मध्यकालीन संतों में संत कबीर का स्थान बहुत ऊंचा है। अपनी सरल तथा सारगर्भित वाणी के कारण कबीर आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। गुरु रविदास, पीपा, दादू, मीरा, रज्जब, मलूकदास, तुकाराम, गरीबदास तथा तुलसी दास आदि संतों ने अपनी वाणी में संत कबीर का उल्लेख बड़े आदर-भाव से किया है। संत वास्तव में सबके होते हैं, उनकी कोई जाति नहीं होती, राष्ट्रीयता की सीमाएं उन्हें नहीं बांध सकती, न ही वे मनुष्य के बनाए हुए भेदभाव को समझते हैं। वे स्वयं कहते हैं कि न मैं हिंदू हूं न मुसलमान, मैं भी सभी के समान पांच तत्त्वों की देह धारण किए हुए हूं तथा मेरे अंदर भी अदृश्य आत्मा निवास करती है: ‘हिंदू कहूं तो मैं नहीं, मुसलमान भी नाहिं।

पांच तत्वों का पूतला, गैबे खेलै माहिं।।’ संत कबीर के शिष्यों में तत्कालीन प्रतिष्ठित समाज के राजा, नवाब तथा सेठ-साहुकार भी थे जो संकेत मात्र से उनके लिए अपनी समस्त संपत्ति तक भेंट कर सकते थे। किंतु उन्होंने कभी भी अपने लिए तथा परिवार के लिए कोई भेंट स्वीकार नहीं की तथा न ही किसी के आगे हाथ पसारा। साधु-संतों के गुणों का बखान करते हुए वे कहते हैं: ‘साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं। धन का भूखा जो फिरे, सो साधू नाहिं।।’ इसे और स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि मांगने से अच्छा तो मर जाना ही बेहतर है: ‘मर जाऊं मांगू नहीं, अपने तन के काज। परमार्थ के कारणें मोहे न आवै लाज।।’ कबीर साहब का मानना था कि संतों को रुपया-पैसा, जमीन-जायदाद से कोई मोह नहीं करना चाहिए। यदि कोई भेंट भी करे तो उसे स्वीकार न करें। संतों को अपने शिष्यों का धन संगत या आम जनों की सेवा में अवश्य लगवा देना चाहिए ताकि उनकी कमाई सफल हो सके।

महात्मा कबीर ने अपने जीवन काल में कभी भी किसी इनसान को ऊंचा और नीचा नहीं माना। उनके अनुसार कोई नीचा नहीं है, अगर कोई नीचा है तो वही है जिसके हृदय में प्रभु भक्ति नहीं है: ‘कहे कबीर मधिम नहीं कोई, सो मधिम जा मुख राम न होई।’ अपना दृष्टांत देते हुए वे कहते हैं कि मेरी नीची जाति को लेकर लोग अक्सर मेरा तिरस्कार करते हैं, किंतु मैं तो अपनी जाति को उत्तम मानता हूं, इस जाति में रहते हुए ही मैंने प्रभु की भक्ति की है: ‘कबीर मेरी जाति कउ सभु को हसनेहारु। बलिहारी इस जाति कउ जिहि जपिओ सिरजनहारु।’ जब उस निराकार ईश्वर की कोई जाति नहीं है तो इनसानों की क्या जाति हो सकती है? उनका मानना था कि इनसान को जात-पात के कीचड़ में नहीं डूबना चाहिए: ‘जात नहीं जगदीश की, हरिजन की कहां होय। जात-पांत के कीच में डूब मरो मत कोय।।’ संत कबीर ने अपनी वाणी में दिखावे की भक्ति को त्यागने की बात की है। वे आडंबरवाद का खंडन करते हैं। उनके अनुसार मूर्ति पूजा कोई महत्त्व नहीं रखती: ‘पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़ । ताते ये चक्की भली, पीसी खाए संसार।।’ महात्मा कबीर ने धार्मिक तीर्थ स्थलों पर बार-बार जाकर स्नान करने के दिखावे का भी खंडन किया है। उनका मानना है कि यदि इन स्थानों पर जाकर स्नान करने से मनुष्य पवित्र हो जाते तो मछली से पवित्र संसार में कोई जीव नहीं होता: ‘नहाए धोए क्या भया, जो मन मैल न जाए। मीन सदा जल में रहे, धोए बास न जाए।।’ महात्मा कबीर ने माला फेरकर भक्ति का दिखावा करने वालों को भी चेताने का प्रयास किया है: ‘माला फेरत जुग भया, मिटा न मनका फेर।

करका मनका डारि के मन का मनका फेर।।’ संत महात्मा कबीर ने आडंबर फैलाने वाले हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को समझाने का प्रयास किया है। वे मुस्लिम धर्म के अनुयायियों द्वारा ऊंची-ऊंची मस्जिदें बनाकर अजान देने का विरोध करते हैं: ‘कंकर-पथर जोरी कै, मस्जिद लयी बनाय। ता चढि़ मुल्ला बांग दे, बहरा हुआ खुदाय।।’ संतों का ज्ञान शास्त्रीय न होकर व्यावहारिक होता है। संत कबीर सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने के लिए जीवनपर्यंत प्रयास करते रहे। उन्होंने संतोष एवं संयम को जीवन में अपनाने पर बल दिया: ‘साईं इतना दीजिए, जा में कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु भी भूखा न जाए।।’ महात्मा कबीर ने मनुष्य जीवन में रहते हुए मांस-मदिरा का सेवन न करने पर बल दिया। उनका मानना है कि जो मनुष्य जीवों की हत्या करते हैं, उन्हें उसका भुगतान अवश्य भोगना पड़ता है: ‘बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल। जो नर बकरी खात है, ताको कौन हवाल।।’ संत कबीर ने जीवन पर्यंत तत्कालीन समाज को सुधारने का प्रयास किया। उनका समाज सुधारात्मक दृष्टिकोण वर्तमान समय में भी प्रासंगिक है तथा जनमानस को दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। संत कबीर का पूरे समाज को संदेश यही है कि जाति-पाति से ऊपर उठकर भगवान का भजन करो तथा समाज में सभी लोगों को मिलजुल कर रहना चाहिए।

 

 

 

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